नए दौर में न्यायपालिका और पत्रकारिता
कोई भी मुद्दा हो, जब भाजपा प्रवक्ताओं के पास कहने को कुछ नहीं होता है
तो वे आपातकाल का ज़िक्र करने लगते हैं. उनके फ़िक्स और सधे हुए डायलॉग होते हैं- 'आपातकाल में जब हुआ, तब आप कहां थे', 'हम पर अंगुली उठाने से
पहले ज़रा आपातकाल को याद कर लीजिए', 'जिन्होंने देश पर आपातकाल थोपा था, वे हमें लोकतंत्र का पाठ न पढ़ाएं' आदि-इत्यादि.
आपातकाल की 44 वीं सालगिरह के मौक़े का इस्तेमाल भी प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कांग्रेस को कोसने और अपनी पीठ थपथपाने के लिए किया. इस मौक़े पर उन्होंने अपने वक्तव्य के साथ एक वीडियो भी टीवी चैनलों के लिए जारी किया, जिसमें चित्रों और रेखांकनों के जरिए आपातकाल की ज़्यादतियों का वर्णन है.
लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद देते हुए भी वे आपातकाल का ज़िक्र करना नहीं भूले. विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, प्रेस सेंसरशिप, न्यायपालिका का दुरुपयोग आदि वही सारे मुद्दे उनके भाषण में रहे जो वे पिछले पांच छह सालों से चुनावी रैलियों में, संसद में, संसद के बाहर सरकारी-ग़ैर सरकारी कार्यक्रमों में और यहां तक कि विदेशी धरती पर भी अक्सर उठाते रहे हैं.
आपातकाल के ज़िक्र वाले मोदी के तमाम भाषण हों या उनकी पार्टी के नेताओं-प्रवक्ताओं के कुतर्की बयान, सबसे ध्वनि यही निकलती है कि हमारी सरकार जो कर रही है उसमें कुछ ग़लत नहीं है और ऐसा तो कांग्रेस के शासनकाल में भी होता रहा है.
लोकसभा में मोदी ने कहा कि 25 जून की तारीख़ भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन है और इसे हमेशा याद रखा जाना चाहिए. उनकी इस बात से कौन इनकार कर सकता है! बेशक आपातकाल को हमेशा याद रखा जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही यह तथ्य भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस 'तानाशाह' इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था, उसी इंदिरा गांधी ने चुनाव भी कराए थे, जिसमें वे और उनकी पार्टी बुरी तरह पराजित हुई थी.
जिस जनता ने इंदिरा गांधी को आपातकाल के लिए यह निर्मम लोकतांत्रिक सज़ा दी थी उसी जनता ने तीन साल बाद हुए मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी की कांग्रेस को दो तिहाई बहुमत के साथ जिता दिया. इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं.
ज़ाहिर है कि देश की जनता ने इंदिरा गांधी को लोकतंत्र से खिलवाड़ करने के उनके गंभीर अपराध के लिए माफ़ कर दिया था. हालांकि इस माफ़ी का यह आशय क़त्तई नहीं था कि जनता ने आपातकाल को और उसके नाम पर हुए सभी कृत्यों को जायज़ मान लिया था.
निस्संदेह आपातकाल हमारे लोकतांत्रिक इतिहास का ऐसा काला अध्याय है जिसे कोई मोदी या कोई अमित शाह याद दिलाए या न दिलाए, देश के लोगों के ज़ेहन में हमेशा बना रहेगा. लेकिन आपातकाल को याद रखना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि इससे भी ज़्यादा ज़रूरी इस बात के लिए सतर्कता बरतना है कि कोई भी हुकूमत आपातकाल को किसी भी रूप में दुहराने का दुस्साहस न कर सके.
सवाल है कि क्या आपातकाल को दोहराने का ख़तरा अभी भी बना हुआ है या किसी नए आवरण में आपातकाल आ चुका है और भारतीय जनमानस उस ख़तरे के प्रति सचेत है?
चार साल पहले आपातकाल के चार दशक पूरे होने के मौक़े पर उस पूरे कालखंड को शिद्दत से याद करते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने देश में फिर से आपातकाल जैसे हालात पैदा होने का अंदेशा जताया था.
एक अंग्रेजी अख़बार को दिए साक्षात्कार में आडवाणी ने देश को अगाह किया था कि 'लोकतंत्र को कुचलने में सक्षम ताक़तें आज पहले से अधिक ताक़तवर है और पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आपातकाबकौल आडवाणी, "भारत का राजनीतिक तंत्र अभी भी आपातकाल की घटना के मायने पूरी तरह से समझ नहीं सका है और मैं इस बात की संभावना से इनकार नहीं करता कि भविष्य में भी इसी तरह से आपातकालीन परिस्थितियां पैदा कर नागरिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है. आज मीडिया पहले से अधिक सतर्क है, लेकिन क्या वह लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध भी है? कहा नहीं जा सकता. सिविल सोसायटी ने भी जो उम्मीदें जगाई थीं, उन्हें वह पूरी नहीं कर सकी हैं. लोकतंत्र के सुचारु संचालन में जिन संस्थाओं की भूमिका होती है, आज भारत में उनमें से केवल न्यायपालिका को ही अन्य संस्थाओं से अधिक ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है."
आडवाणी का यह बयान हालांकि चार साल पुराना है लेकिन इसकी प्रासंगिकता चार वर्ष पहले से कहीं ज़्यादा आज महसूस की जा सकती है. आधुनिक भारत के राजनीतिक विकास के सफर में लंबी और सक्रिय भूमिका निभा चुके एक तजुर्बेकार राजनेता के तौर पर आडवाणी की इस आशंका को अगर हम अपनी राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं के मौजूदा स्वरूप और संचालन संबंधी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि आज देश आपातकाल से भी कहीं ज़्यादा बुरे दौर से गुज़र रहा है.
इंदिरा गांधी ने तो संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेकर देश पर आपातकाल थोपा था, लेकिन आज तो औपचारिक तौर पर आपातकाल लागू किए बग़ैर ही वह सब कुछ बल्कि उससे भी कहीं ज़्यादा हो रहा है जो आपातकाल के दौरान हुआ था. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आपातकाल के दौरान सब कुछ अनुशासन के नाम पर हुआ था और आज जो कुछ हो रहा है वह विकास और राष्ट्रवाद के नाम पर.
केंद्र सहित देश के लगभग आधे राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर भी हाल के वर्षों में ऐसी प्रवृत्तियां मज़बूत हुई हैं, जिनका लोकतांत्रिक मूल्यों और कसौटियों से कोई सरोकार नहीं है. सरकार और पार्टी में सारी शक्तियां एक समूह के भी नहीं बल्कि एक ही व्यक्ति के इर्द गिर्द सिमटी हुई हैं.
आपातकाल के दौर में उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने चाटुकारिता और राजनीतिक बेहयाई की सारी सीमाएं लांघते हुए 'इंदिरा इज़ इंडिया-इंडिया इज़ इंदिरा' का नारा पेश किया था. आज भाजपा में तो अमित शाह, रविशंकर प्रसाद, शिवराज सिंह चौहान, देवेंद्र फडनवीस आदि से लेकर नीचे के स्तर तक ऐसे कई नेता हैं जो नरेंद्र मोदी को जब-तब दैवीय शक्ति का अवतार बताने में कोई संकोच नहीं करते. वैसे इस सिलसिले की शुरुआत बतौर केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायडू ने की थी, जो अब उपराष्ट्रपति बनाए जा चुके हैं.
आपातकाल की 44 वीं सालगिरह के मौक़े का इस्तेमाल भी प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में कांग्रेस को कोसने और अपनी पीठ थपथपाने के लिए किया. इस मौक़े पर उन्होंने अपने वक्तव्य के साथ एक वीडियो भी टीवी चैनलों के लिए जारी किया, जिसमें चित्रों और रेखांकनों के जरिए आपातकाल की ज़्यादतियों का वर्णन है.
लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद देते हुए भी वे आपातकाल का ज़िक्र करना नहीं भूले. विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, प्रेस सेंसरशिप, न्यायपालिका का दुरुपयोग आदि वही सारे मुद्दे उनके भाषण में रहे जो वे पिछले पांच छह सालों से चुनावी रैलियों में, संसद में, संसद के बाहर सरकारी-ग़ैर सरकारी कार्यक्रमों में और यहां तक कि विदेशी धरती पर भी अक्सर उठाते रहे हैं.
आपातकाल के ज़िक्र वाले मोदी के तमाम भाषण हों या उनकी पार्टी के नेताओं-प्रवक्ताओं के कुतर्की बयान, सबसे ध्वनि यही निकलती है कि हमारी सरकार जो कर रही है उसमें कुछ ग़लत नहीं है और ऐसा तो कांग्रेस के शासनकाल में भी होता रहा है.
लोकसभा में मोदी ने कहा कि 25 जून की तारीख़ भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन है और इसे हमेशा याद रखा जाना चाहिए. उनकी इस बात से कौन इनकार कर सकता है! बेशक आपातकाल को हमेशा याद रखा जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही यह तथ्य भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस 'तानाशाह' इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया था, उसी इंदिरा गांधी ने चुनाव भी कराए थे, जिसमें वे और उनकी पार्टी बुरी तरह पराजित हुई थी.
जिस जनता ने इंदिरा गांधी को आपातकाल के लिए यह निर्मम लोकतांत्रिक सज़ा दी थी उसी जनता ने तीन साल बाद हुए मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी की कांग्रेस को दो तिहाई बहुमत के साथ जिता दिया. इंदिरा गांधी फिर प्रधानमंत्री बनीं.
ज़ाहिर है कि देश की जनता ने इंदिरा गांधी को लोकतंत्र से खिलवाड़ करने के उनके गंभीर अपराध के लिए माफ़ कर दिया था. हालांकि इस माफ़ी का यह आशय क़त्तई नहीं था कि जनता ने आपातकाल को और उसके नाम पर हुए सभी कृत्यों को जायज़ मान लिया था.
निस्संदेह आपातकाल हमारे लोकतांत्रिक इतिहास का ऐसा काला अध्याय है जिसे कोई मोदी या कोई अमित शाह याद दिलाए या न दिलाए, देश के लोगों के ज़ेहन में हमेशा बना रहेगा. लेकिन आपातकाल को याद रखना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि इससे भी ज़्यादा ज़रूरी इस बात के लिए सतर्कता बरतना है कि कोई भी हुकूमत आपातकाल को किसी भी रूप में दुहराने का दुस्साहस न कर सके.
सवाल है कि क्या आपातकाल को दोहराने का ख़तरा अभी भी बना हुआ है या किसी नए आवरण में आपातकाल आ चुका है और भारतीय जनमानस उस ख़तरे के प्रति सचेत है?
चार साल पहले आपातकाल के चार दशक पूरे होने के मौक़े पर उस पूरे कालखंड को शिद्दत से याद करते हुए भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने देश में फिर से आपातकाल जैसे हालात पैदा होने का अंदेशा जताया था.
एक अंग्रेजी अख़बार को दिए साक्षात्कार में आडवाणी ने देश को अगाह किया था कि 'लोकतंत्र को कुचलने में सक्षम ताक़तें आज पहले से अधिक ताक़तवर है और पूरे विश्वास के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि आपातकाबकौल आडवाणी, "भारत का राजनीतिक तंत्र अभी भी आपातकाल की घटना के मायने पूरी तरह से समझ नहीं सका है और मैं इस बात की संभावना से इनकार नहीं करता कि भविष्य में भी इसी तरह से आपातकालीन परिस्थितियां पैदा कर नागरिक अधिकारों का हनन किया जा सकता है. आज मीडिया पहले से अधिक सतर्क है, लेकिन क्या वह लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध भी है? कहा नहीं जा सकता. सिविल सोसायटी ने भी जो उम्मीदें जगाई थीं, उन्हें वह पूरी नहीं कर सकी हैं. लोकतंत्र के सुचारु संचालन में जिन संस्थाओं की भूमिका होती है, आज भारत में उनमें से केवल न्यायपालिका को ही अन्य संस्थाओं से अधिक ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है."
आडवाणी का यह बयान हालांकि चार साल पुराना है लेकिन इसकी प्रासंगिकता चार वर्ष पहले से कहीं ज़्यादा आज महसूस की जा सकती है. आधुनिक भारत के राजनीतिक विकास के सफर में लंबी और सक्रिय भूमिका निभा चुके एक तजुर्बेकार राजनेता के तौर पर आडवाणी की इस आशंका को अगर हम अपनी राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं के मौजूदा स्वरूप और संचालन संबंधी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम पाते हैं कि आज देश आपातकाल से भी कहीं ज़्यादा बुरे दौर से गुज़र रहा है.
इंदिरा गांधी ने तो संवैधानिक प्रावधानों का सहारा लेकर देश पर आपातकाल थोपा था, लेकिन आज तो औपचारिक तौर पर आपातकाल लागू किए बग़ैर ही वह सब कुछ बल्कि उससे भी कहीं ज़्यादा हो रहा है जो आपातकाल के दौरान हुआ था. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आपातकाल के दौरान सब कुछ अनुशासन के नाम पर हुआ था और आज जो कुछ हो रहा है वह विकास और राष्ट्रवाद के नाम पर.
केंद्र सहित देश के लगभग आधे राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर भी हाल के वर्षों में ऐसी प्रवृत्तियां मज़बूत हुई हैं, जिनका लोकतांत्रिक मूल्यों और कसौटियों से कोई सरोकार नहीं है. सरकार और पार्टी में सारी शक्तियां एक समूह के भी नहीं बल्कि एक ही व्यक्ति के इर्द गिर्द सिमटी हुई हैं.
आपातकाल के दौर में उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने चाटुकारिता और राजनीतिक बेहयाई की सारी सीमाएं लांघते हुए 'इंदिरा इज़ इंडिया-इंडिया इज़ इंदिरा' का नारा पेश किया था. आज भाजपा में तो अमित शाह, रविशंकर प्रसाद, शिवराज सिंह चौहान, देवेंद्र फडनवीस आदि से लेकर नीचे के स्तर तक ऐसे कई नेता हैं जो नरेंद्र मोदी को जब-तब दैवीय शक्ति का अवतार बताने में कोई संकोच नहीं करते. वैसे इस सिलसिले की शुरुआत बतौर केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायडू ने की थी, जो अब उपराष्ट्रपति बनाए जा चुके हैं.
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